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ग़ज़ल
इक क़लंदर की तरह वक़्त रहा महव-ए-ख़िराम
उस ने कब ध्यान ''तलब'' शोर-ए-सगाँ पर रक्खा
ख़ुर्शीद तलब
ग़ज़ल
देखना ऐ 'दर्द' हो जाएँगे दिल कितने असीर
ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ आज वो खोले हुए महफ़िल में है