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ग़ज़ल
कहाँ जाम-ए-ग़म की तल्ख़ी कहाँ ज़िंदगी का दरमाँ
मुझे वो दवा मिली है जो मिरी दवा नहीं है
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
कभी तो ज़िंदगी ख़ुद भी इलाज-ए-ज़िंदगी करती
अजल करती रहे दरमान-ए-दर्द-ए-ज़िंदगी कब तक
सबा अकबराबादी
ग़ज़ल
दिल के बहलाने का वहशत में ये सामाँ करना
चश्म-ए-ख़ूँ-बार से दामन को गुलिस्ताँ करना
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
दिया यारों ने बे-होशी में दरमाँ का फ़रेब आख़र
हुआ सकते से मैं आईना-ए-दस्त-ए-तबीब आख़र
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
तुम जो चाहो तो मिरे दर्द का दरमाँ हो जाए
वर्ना मुश्किल है कि मुश्किल मिरी आसाँ हो जाए