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ग़ज़ल
या ख़ला पर हुक्मराँ या ख़ाक के अंदर निहाँ
ज़िंदगी डट कर अनासिर के मुक़ाबिल आ गई
हफ़ीज़ होशियारपुरी
ग़ज़ल
ग़म ने हर इक रास्ते में खोल रक्खा था महाज़
हम भी चेहरे पर हँसी का ख़ोल ले कर डट गए
आनन्द सरूप अंजुम
ग़ज़ल
तब सैर देखे कोई बाहम लड़ाईयों के
खींचे हों वो तो तेग़ा और हम भी डट रहे हों
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
सच्चाई वो जंग है जिस में बाज़ औक़ात सिपाही को
आप मुक़ाबिल अपने ही डट जाना पड़ता है