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ग़ज़ल
दुनिया अपनी मौत जल्द-अज़-जल्द मर जाने को है
अब ये ढाँचा ऐसा लगता है बिखर जाने को है
शहज़ाद अंजुम बुरहानी
ग़ज़ल
अदू कम्बख़्त को सौदा है कुछ ऐसा जुदाई का
लिए सर पर फिरा करता है ढाँचा चारपाई का
मास्टर बासित बिस्वानी
ग़ज़ल
नक़ाब-ए-रुख़ उलट कर आ रहे थे वो सर-ए-महफ़िल
हुईं जब मुझ से चार आँखें तो झट शर्मा के मुँह ढाँका
सय्यद अहमद चिश्ती देहलवी
ग़ज़ल
ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है
जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
वो नवा-ए-मुज़्महिल क्या न हो जिस में दिल की धड़कन
वो सदा-ए-अहल-ए-दिल क्या जो अवाम तक न पहुँचे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
हर धड़कन हैजानी थी हर ख़ामोशी तूफ़ानी थी
फिर भी मोहब्बत सिर्फ़ मुसलसल मिलने की आसानी थी