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ग़ज़ल
मोहब्बत में नहीं दिखती इबादत वो पुरानी सी
ज़माने में कहीं अब कोई पागल क्यों नहीं होता
राघवेंद्र द्विवेदी
ग़ज़ल
ऐसे मुझ पर भी तिरे ग़म के निशाँ दिखते हैं
जैसे मौसम का 'इमारत पे असर पड़ता है
मोहसिन आफ़ताब केलापुरी
ग़ज़ल
हसीनों की नुमाइश में मोहब्बत तो नहीं दिखती
ये पहचाने तो जाते हैं मगर जाने नहीं जाते
साहिल अजमेरी
ग़ज़ल
हम को जो दिखती है दुनिया अस्ल में वो है नहीं
जिन का मज़हब तीरगी है रौशनी के साथ हैं