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ग़ज़ल
दीदा-ए-बे-रंग में ख़ूँ-रंग मंज़र रख दिए
हम ने इस दश्त-ए-तपाँ में भी समुंदर रख दिए
बख़्श लाइलपूरी
ग़ज़ल
उदासी थी कि था इक जल्वा-ए-सद-रंग-ओ-बू शायद
दिल-ए-बे-रंग भी रंगों का शीराज़ा नज़र आया
सय्यद अमीन अशरफ़
ग़ज़ल
शरीक-ए-हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार आज भी है
किसी की याद मिरी ग़म-गुसार आज भी है