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ग़ज़ल
दुर्रा-ए-मौज लगाता है उसे बे-तक़सीर
क्यूँ न हो लाशा मिरा शिकवा-गुज़ार-ए-दरिया
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
बहर-ए-उल्फ़त में सफ़ीने तो बहुत हैं ऐ 'मौज'
मेरी ही कश्ती को घेरे हुए तूफ़ाँ क्यूँ हैं
मोज फ़तेहगढ़ी
ग़ज़ल
ये ज़ौक़-ए-सैर मिरा ये तबाही-ए-तूफ़ाँ
मैं इक वबाल हूँ ऐ 'मौज' नाख़ुदा के लिए
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
बहर-ए-उल्फ़त में नहीं ख़्वाहिश-ए-साहिल ऐ 'मौज'
मैं न तूफ़ान को छोड़ूँगा न तूफ़ाँ मुझ को
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
हूँ आज फ़िक्र का इक बहर-ए-बे-कराँ ऐ 'मौज'
वो 'मौज' ही नहीं बेताब जो जहाँ में नहीं
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
ऐ 'मौज' हम ने ग़र्क़ सफ़ीना ही कर दिया
मिन्नत-कश-ए-तलातुम-ओ-तूफ़ाँ कहाँ रहे
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
राह-ए-तलब की मुश्किलें और ये मेरी ख़ुद-रवी
चारों तरफ़ हूँ मैं ही मैं कोई भी दूसरा नहीं
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
'मौज' सफ़ीना-ए-हयात बहर-ए-वफ़ा में छोड़ दे
जोश बढ़ा हुआ न देख लहर उठी हुई न देख