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ग़ज़ल
मसर्रतों की धूप उन के फ़्लैट में है रात दिन
हमारे ग़म की बस्तियों में कर्ब-ए-जावेदाँ रहे
रमेश कँवल
ग़ज़ल
खुली खिड़कियों के फ़्लैट से ज़रा झाँक शाम को रोड पर
तिरे इंतिज़ार की मंज़िलें हैं मिरी कमंद के सामने
मंसूर आफ़ाक़
ग़ज़ल
ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज्दाद बेच देगी
जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है
तहज़ीब हाफ़ी
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
जिस घड़ी आया पलट कर इक मिरा बिछड़ा हुआ
आम से कपड़ों में था वो फिर भी शहज़ादा लगा