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ग़ज़ल
अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है
अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
त'अज्जुब से वो बोला यूँ भी होता है ज़माने में
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
नाज़ ओ अदा ओ ग़म्ज़ा निगह पंजा-ए-मिज़ा
मारें हैं एक दिल को ये पिल पिल के चार पाँच
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
करे है सर्फ़ ब-ईमा-ए-शो'ला क़िस्सा तमाम
ब-तर्ज़-ए-अहल-ए-फ़ना है फ़साना-ख़्वानी-ए-शमअ'
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
सुन के आमद उन की अज़-ख़ुद-रफ़्ता हो जाते हैं हम
पेशवा लेने को जाना कोई हम से सीख जाए
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
पाँव पड़ कर कहती है ज़ंजीर-ए-ज़िंदाँ में रहो
वहशत-ए-दिल का है ईमा राह-ए-सहरा लीजिए