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ग़ज़ल
मैं हूँ कि इश्तियाक़ में सर-ता-क़दम नज़र
वो हैं कि इक नज़र की इजाज़त नहीं मुझे
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
बस इश्तियाक़-ए-तकल्लुम में बार-हा हम लोग
जवाब दिल में ज़बाँ पर सवाल रखते थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
अगर क़ब्रें नज़र आतीं न दारा-ओ-सिकन्दर की
मुझे भी इश्तियाक़-ए-दौलत-ओ-जाह-ओ-हशम होता
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
उन्हीं को अर्ज़-ए-वफ़ा का था इश्तियाक़ बहुत
उन्हीं को अर्ज़-ए-वफ़ा ना-गवार गुज़री है
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
इश्तियाक़-ए-मय-कशी कुछ मय-कशी से कम नहीं
हम तो साक़ी मस्त हो जाते हैं ख़ाली जाम से