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ग़ज़ल
का'बे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर
बुत-ख़ाने में काफ़िर को भी काफ़िर नहीं कहते
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
अगर काबे का रुख़ भी जानिब-ए-मय-ख़ाना हो जाए
तो फिर सज्दा मिरी हर लग़्ज़िश-ए-मस्ताना हो जाए
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
तेरे घर आएँ तो ईमान को किस पर छोड़ें
हम तो का'बे ही में ऐ दुश्मन-ए-दीं अच्छे हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
वफ़ा-दारी ब-शर्त-ए-उस्तुवारी अस्ल ईमाँ है
मरे बुत-ख़ाने में तो का'बे में गाड़ो बरहमन को
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बुत भी इस में रहते थे दिल यार का भी काशाना था
एक तरफ़ काबे के जल्वे एक तरफ़ बुत-ख़ाना था
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
काबे से तअ'ल्लुक़ है न बुत-ख़ाने का ग़म है
हासिल मिरे सज्दों का तिरा नक़्श-ए-क़दम है
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
कजी जिन की तबीअत में है कब होती वो सीधी है
कहो शाख़-ए-गुल-ए-तस्वीर से किस तरह ख़म निकले