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ग़ज़ल
गुल-ए-रंगीं ये कहता है कि खिलना हुस्न खोना है
मगर ग़ुंचा समझता है निखरता जा रहा हूँ मैं
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
जो गुलशन में किसी ने देख खिलना ग़ुंचा-ए-गुल का
कहा बस आ के याँ लज़्ज़त उठाना इस को कहते हैं
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
गुल-ए-पज़मुर्दा से ग़ुंचे को हमदर्दी नहीं मुमकिन
अभी तो इस को खिलना है अभी इस को सँवरना है
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
नज़र आता नहीं शबनम का गिरना फूल का खिलना
मोहब्बत की हक़ीक़त ना-गहाँ मा'लूम होती है
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
बाग़ से फूल चुराने वाली लड़की को ये क्या मा'लूम
उस के क़दमों की हर चाप पे फूल को खिलना आता है
वसीम ताशिफ़
ग़ज़ल
मौसम-ए-हिज्राँ में ये बारिश ये ख़ुशबू ये घटा
क्या ये कुछ कम था के हम फूलों का खिलना सह गए