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ग़ज़ल
इस ज़मीं में वो है इक बाग़ लगा ऐ 'इंशा'
जो कि तूबा की भी चोटी को कुतर लेता है
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
कुतर डालो उसे जितना भी तुम सोने की क़ैंची से
परिंदे का निकल आता है पर आहिस्ता आहिस्ता
असर निज़ामी
ग़ज़ल
ये कोशिश थी कि बाहम दाम को ही ले उड़ें लेकिन
तने हल्क़ों को इतने में कुतर डाला परिंदों ने
वली आलम शाहीन
ग़ज़ल
किया ख़ाक आतिश-ए-इश्क़ ने दिल-ए-बे-नवा-ए-'सिराज' कूँ
न ख़तर रहा न हज़र रहा मगर एक बे-ख़तरी रही