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ग़ज़ल
इस ज़मीं में वो है इक बाग़ लगा ऐ 'इंशा'
जो कि तूबा की भी चोटी को कुतर लेता है
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
कुतर डालो उसे जितना भी तुम सोने की क़ैंची से
परिंदे का निकल आता है पर आहिस्ता आहिस्ता