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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
जिस चीज़ से तुझ को निस्बत है जिस चीज़ की तुझ को चाहत है
वो सोना है वो हीरा है वो माटी हो या कंकर हो
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ये बूँदें पहली बारिश की, ये सोंधी ख़ुशबू माटी की
इक कोयल बाग़ में कूकी है, आवाज़ यहाँ तक आई है
अज़ीज़ नबील
ग़ज़ल
सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की कियारी है
परी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधन से मारी है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
स्टेशन के पेड़ों को पहले चूने से रंगते हैं
फिर उन पर क्या लिक्खा जाता है रंगों की मिट्टी से
बशीर बद्र
ग़ज़ल
बेकल उत्साही
ग़ज़ल
मेरा माज़ी मुझ से बिछड़ कर क्या जाने किस हाल में है
मेरी तरह वो भी तन्हा हो ये भी तो हो सकता है
ज़का सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
वो चंद्र-किरन वो रूप-मति वो मेरी कविता मेरी ग़ज़ल
मेले में कुछ ऐसे बिछड़ी डूब गई अँधियारों में
इशरत क़ादरी
ग़ज़ल
या रब न हिन्द ही में ये माटी ख़राब हो
जा कर नजफ़ में ख़ाक-ए-दर-ए-बू-तुराब हो
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
ग़ज़ल
यूँ क़दम रख न ज़मीं पर तिरी रफ़्तार से आह
दिल किसी का है कि माटी में मिला जाता है