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ग़ज़ल
इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा
इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
शहरों में ही ख़ाक उड़ा लो शोर मचा लो बे-जा लो
जिन दश्तों की सोच रहे हो वो कब के बरबाद हुए