aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "malak"
तुम कौन से थे ऐसे खरे दाद-ओ-सितद केकरता मलक-उल-मौत तक़ाज़ा कोई दिन और
मैं वो इस्म-ए-अज़ीम हूँ जिस कोजिन्न-ओ-मलक ने सज्दा किया था
है मिरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलीलजिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं
ये ज़ाएरों को मिलीं सरफ़राज़ियाँ वर्नाकहाँ नसीब कि चूमें मलक जबीनों को
न मलक सवाल करते न लहद फ़िशार देतीसर-ए-राह-ए-कू-ए-क़ातिल जो मिरा मज़ार होता
तुम्हीं ने क़त्ल किया है मुझे जो तनते होअकेले थे मलक-उल-मौत हम-रिकाब न था
थी ये सब काएनात ज़ेर-ए-नगींसाथ मोर-ओ-मलख़ सा लश्कर था
'ग़ालिब' कुछ अपनी स'ई से लहना नहीं मुझेख़िर्मन जले अगर न मलख़ खाए किश्त को
दहशत में पड़ गया मलक-उल-मौत देख करफिर उस ने काटी तार-ए-नफ़स चीख़ता रहा
मलक-उल-मौत के घर का था इरादा अपनाले गया शौक़-ए-ग़लत-कार तिरे कूचे में
मलक-उल-मौत अगर कहिए उन्हें तो है बजाक़त्ल बे-तेग़ परी-ज़ाद किया करते हैं
मिन्नत से मनाते हैं मुझे मैं नहीं मनताऔज़ा-ए-मलक देख और अतवार-ए-गदा देख
मौज-ए-हवा-ए-गुल सा वो गुज़रा था एक बारफिर भी मशाम-ए-जाँ में महक छोड़ कर गया
करें हैं दा'वा ख़ुश-चश्मी-ए-आहुवान-ए-दश्तटक एक देखने चल मलक उन गँवारों का
मुश्किल है होना रू-कश रुख़्सार की झलक केहम तो बशर हैं उस जा पर जुलते हैं मलक के
सो मलक फिरा लेकिन पाई न वफ़ा इक जाजी खा गई है मेरा इस जिंस की नायाबी
फ़लक और उसे झुकाए सर-ए-मंज़िल-ए-सफ़ीहाँमलक आएँ जिस के दर पर ब-हवा-ए-जब्हा-साई
मलक-उल-मौत से कहो फिर जाएँजीते-जी मर चुका हूँ मैं कब का
मलक-उल-मौत पे झलने को बनाता मैं चँवरताएर-ए-रूह की दम में जो कोई पर होता
क्यूँकर मलक कहूँ कि मलक ख़ादिम आप केहैं वो बशर कि मलती हैं ख़ैरुल-बशर से आप
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