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ग़ज़ल
अरे हैरत से क्या देखे हैं आँखों को हमारी
ये मश्कीज़े तो इक मुद्दत से ख़ाली हो चुके हैं
यूनुस तहसीन
ग़ज़ल
मैं ने कहा था प्यास के मारे काली रेत पे मर जाएँगे
उस ने कहा था ठीक है लेकिन दो मश्कीज़े भरे हुए हैं