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ग़ज़ल
कम नहीं मिल्क-ए-सुलेमाँ से विसाल-ए-साक़ी
गर्दिश-ए-जाम मुझे हल्क़ा-ए-ख़ातम हो जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो