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ग़ज़ल
नसीहत मुझ को तर्क-ए-इश्क़ की कुछ फ़र्ज़ नहीं तुझ पर
न छोड़ ऐ शैख़ सुन्नत मुँह में नित मिसवाक रहने दे
वली उज़लत
ग़ज़ल
अजब क्या है तिरी ख़ुश्की की शामत से जो तू ज़ाहिद
नहाल-ए-ताक बिठलावे तो वो मिसवाक हो जावे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल
तमाम इल्म ज़ीस्त का गुज़िश्तगाँ से ही हुआ
अमल गुज़िश्ता दौर का मिसाल में मिला मुझे
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
यही मस्लक है मिरा, और यही मेरा मक़ाम
आज तक ख़्वाहिश-ए-मंसब से अलग बैठा हूँ