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ग़ज़ल
मोहम्मद इज़हारुल हक़
ग़ज़ल
मुर्ग़ान-ए-क़फ़स को फूलों ने ऐ 'शाद' ये कहला भेजा है
आ जाओ जो तुम को आना हो ऐसे में अभी शादाब हैं हम
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मुँह पे ले दामन-ए-गुल रोएँगे मुर्ग़ान-ए-चमन
बाग़ में ख़ाक उड़ाएगी सबा मेरे बा'द
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-दिलदारी-ए-गुलज़ार करूँ या न करूँ
ज़िक्र-ए-मुर्ग़ान-ए-गिरफ़्तार करूँ या न करूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
फिर इस के बाद शब है जिस की हद सुब्ह-ए-अबद तक है
मुग़न्नी शाम का नग़्मा सुना आहिस्ता आहिस्ता
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
देख लो ऐ गुल-रुख़ो मुर्ग़ान-ए-दिल पाबंद हैं
बाल के फंदे की सूरत हैं तुम्हारी चूड़ियाँ
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
रहेगा बन के बीनाई वो मुरझाई सी आँखों में
जो बूढे बाप के हाथों में मेहनत की कमाई दे
नक़्श लायलपुरी
ग़ज़ल
जो मा'बूदान-ए-बातिल की जहाँ में सरवरी होती
मुक़ाबिल हैदरी के पस्त क्यूँ कर मरहबी होती