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ग़ज़ल
रच गया है मेरी नस नस में मिरी रातों का ज़हर
मेरे सूरज को बुला दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
हर हर साँस नई ख़ुश्बू की इक आहट सी पाता है
इक इक लम्हा अपने हाथ से जैसे निकला जाता है
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
साँसों की तरह मैं तेरी नस नस में रहूँगा
खो कर तू मुझे ख़ुद भी अज़ाबों में रहेगा