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ग़ज़ल
जितने भी दिल-फेंक थे शाएर यू-एस में आबाद हुए
नाईट-क्लबों की रौनक़ ने बेचारों को मार दिया
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
होंटों पर महसूस हुई है आँखों से मादूम रही है
फुलवारी की ''निगहत-दुल्हन' फुलवारी में घूम रही है
शाद आरफ़ी
ग़ज़ल
आशिक़-ए-रू-ए-बुताँ को निगहत-ए-गुल से ग़रज़
हो सके तो ऐ सबा इत्र-ए-गुल-ए-रुख़्सार खींच
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
तमाम रंगों की एक रंगत तमाम मौसम की एक निगहत
तमाम चेहरे हसीन लिखना तमाम आँखें सराब पढ़ना
हसन रिज़वी
ग़ज़ल
पास-ए-नामूस-ए-तमन्ना हर इक आज़ार में था
नश्शा-ए-निगहत-ए-गुल भी ख़लिश-ए-ख़ार में था
होश तिर्मिज़ी
ग़ज़ल
अपने हाथों अपनी आँखें बंद करनी पड़ गईं
निगहत-ए-गुल के जिलौ में गर्द-ए-सहरा देख कर
अख़्तर होशियारपुरी
ग़ज़ल
हवा पे जिस के क़दम हैं मिसाल-ए-निगहत-ए-गुल
असीर है मिरे शे'रों में नग़्मगी की तरह
सज्जाद बाक़र रिज़वी
ग़ज़ल
कभी बिखर गए बातों में मिस्ल-ए-निगहत-ए-गुल
कभी कली की तरह मुँह से कुछ कहा न गया