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ग़ज़ल
रंग हवा से यूँ टपके है जैसे शराब चुवाते हैं
आगे हो मय-ख़ाने के निकलो अहद-ए-बादा-गुसाराँ है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
काम तो काफ़ी रहता है लेकिन करना है किस ने यहाँ
बे-शक रोज़ इधर आ निकलो फ़ुर्सत बहुत ज़ियादा है
ज़फ़र इक़बाल
ग़ज़ल
मुसाफ़िर हो तो निकलो पाँव में आँखें लगा कर
किसी भी हम-सफ़र से रास्ता क्यूँ माँगते हो
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
ऐ दिल वालो घर से निकलो देता दावत-ए-आम है चाँद
शहरों शहरों क़रियों क़रियों वहशत का पैग़ाम है चाँद
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
दश्त में निकलो तो काँटा है थकन है गर्द है
नाव में बैठो तो लगता है भँवर है ज़िंदगी
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
बशीर बद्र
ग़ज़ल
मैं ऐसी शोहरतों की सोच से भी ख़ौफ़ खाता हूँ
जिधर निकलो उधर अख़बार वाले घेर लेते हैं
प्रबुद्ध सौरभ
ग़ज़ल
कभी तो अब्र बन कर झूम कर निकलो कहीं बरसो
कि हर मौसम में ये संजीदगी अच्छी नहीं लगती
देवमणि पांडेय
ग़ज़ल
कुछ भूली-बिसरी यादों का अलबेला शहर बसाया है
कोई वक़्त मिले तो आ निकलो यहीं मिलता हूँ यहीं रहता हूँ
अतहर नफ़ीस
ग़ज़ल
तमन्नाओं के अंधे शहर में जब माँगने निकलो
तो चादर सब्र की सदियों पुरानी पुश्त पर रखना