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ग़ज़ल
क्या बे-नुक़त सुनाई हैं उस तिफ़्ल-ए-शौक़ ने
क़ासिद ने नामा दे के तलब जब रसीद की
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
किस से पढ़ावे कोई ख़त इंशा ही जिस का हो ग़लत
यानी कि उस ने बे-नुक़त भेजी हैं लिख के गालियाँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
मज़मून सोज़-ए-दिल का कहते ही उड़ने लागे
हर्फ़ ओ नुक़त शरर-साँ यकसाँ किताबतों से
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
दीवान-ए-बे-नुक़त से है तेरा 'वक़ार-हिल्म'
कहती है अहल-ए-फ़न से ये गौहर-ब-कफ़ हवा