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ग़ज़ल
तीर आया था जिधर से ये मिरे शहर के लोग
कितने सादा हैं कि मरहम भी वहीं देखते हैं
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
ये बुत-कदा है इधर आइए ज़रा 'बिस्मिल'
बुतों की याद में बंदे ख़ुदा के बैठे हैं
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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तीर आया था जिधर से ये मिरे शहर के लोग
कितने सादा हैं कि मरहम भी वहीं देखते हैं
ये बुत-कदा है इधर आइए ज़रा 'बिस्मिल'
बुतों की याद में बंदे ख़ुदा के बैठे हैं