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ग़ज़ल
हाज़िर हैं कलीसा में कबाब ओ मय-ए-गुलगूँ
मस्जिद में धरा क्या है ब-जुज़ मौइज़ा ओ पंद
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ग़ज़ल-ख़्वानी को तू इस बज़्म में आया नहीं 'नादिर'
तुझे याँ वाज़ कहना पंद-ए-सूद-आमेज़ करना है