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ग़ज़ल
जिस पंछी की परवाजों में जोश-ए-जुनूँ भी शामिल हो
उस की ख़ातिर आब-ओ-दाना पहले भी था आज भी है
हस्तीमल हस्ती
ग़ज़ल
टकरा जाते हैं रह-रह कर मेरे परों से हफ़्त-अफ़्लाक
खुली फ़ज़ा मिलना मुश्किल है 'ज़ेब' मिरी परवाजों को