aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "phaa.d"
तिरे ग़ुरूर का हुलिया बिगाड़ डालूँगामैं आज तेरा गरेबान फाड़ डालूँगा
ग़ुस्से से उठ चले हो तो दामन को झाड़ करजाते रहेंगे हम भी गरेबान फाड़ कर
मैं इस जहान की क़िस्मत बदलने निकला थाऔर अपने हाथ का लिक्खा ही फाड़ आया हूँ
फाड़ खाता है जो ग़ैरों को झपट कर सग-ए-यारमैं ये कहता हूँ मिरे शेर तिरा क्या कहना
मिरे ख़ुतूत तो झल्ला के फाड़ देता हैअजीब बात है पुर्ज़ों को फेंकता भी नहीं
सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख करलिफ़ाफ़ा फाड़ दिया फिर तिरा पता लिख कर
शेर आ के चीर फाड़ गया मुझ को ख़्वाब मेंदम-भर को मेरी आँख लगी थी मचान पर
हवा ने फाड़ दी तस्वीर लेकिनअभी इक कील सीने में गड़ी है
हुस्न-ए-तसव्वुरात में लिक्खेंगे एक ख़तलिक्खेंगे फाड़ देंगे जलाएँगे आप भी
उस को मतलूब हैं कुछ क़ल्ब ओ जिगर के टुकड़ेजैब ओ दामन न कोई फाड़ के दीवाना बने
मैं कितने अशआर लिख के काग़ज़ पे फाड़ देता हूँ बे-ख़ुदी मेंमुझे पता है मैं अज़दहा बन के अपने बच्चे निगल रहा हूँ
किताब-ए-ज़ीस्त तुझे ग़म नहीं थमाता कोईमैं दिन गुज़ार के सफ़्हे को फाड़ लेता हूँ
यही ख़याल मुझे आ के चीर-फाड़ गयामिले हैं दोस्त भी यूसुफ़ के भाइयों की तरह
मजनूँ का अंजाम तो सोचयार मिरे मत कपड़े फाड़
जो अपने हाथों से फाड़ के फेंकी थीदिल में इक तस्वीर वही रक्खी निकली
नक सूँ तस्वीर करने जोबन परकंचकी फाड़ फाड़ तार किए
बस्ती तुझ बिन उजाड़ सी हैकम-बख़्त ये शब पहाड़ सी है
मैं ओढ़ कर ख़ुद को सो गया था कि बे-ख़तर थाकोई परिंदा जो फड़-फड़ाया तो मैं ने जाना
आईना देखता है गरेबाँ को फाड़ करवहशी अब अपना आप ही दीवाना हो गया
अबस मत देख आँखें फाड़ फाड़ इन चश्म-ए-ख़ूनीं कूँपड़ा नीं नर्गिस-ए-बाग़ी तुझे काम इन हरीफ़ों सीं
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