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ग़ज़ल
कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला
और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ऐ काश हमारी आँखों का इक्कीसवाँ ख़्वाब तो अच्छा हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
कौन ग़ुलाम मोहम्मद 'क़ासिर' बेचारे से करता बात
ये चालाकों की बस्ती थी और हज़रत शर्मीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है
इस शहर का हर रहने वाला क्यूँ दूसरे शहर में रहता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है
मैं जिस पल से गुज़रता हूँ मोहब्बत साथ होती है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है
ज़िंदगी से ये मिरा दूसरा समझौता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
कोई मुँह फेर लेता है तो 'क़ासिर' अब शिकायत क्या
तुझे किस ने कहा था आइने को तोड़ कर ले जा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
रात उस के सामने मेरे सिवा भी मैं ही था
सब से पहले मैं गया था दूसरा भी मैं ही था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
लफ़्ज़ों का बेवपार न आया उस को किसी महँगाई में
कल भी 'क़ासिर' कम-क़ीमत था आज भी क़ासिर सस्ता है