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ग़ज़ल
जा के सुनूँ आसार-ए-चमन में साएँ साएँ शाख़ों की
ख़ाली महल के बुर्जों से दीदार-ए-बर्क़-ओ-बाद करूँ
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
मुहीब रातों में डगमगाते दुखी बदन के मुसाफ़िरों को
अकेले-पन में डरा रही है समय के जंगल की साएँ साएँ
असलम अंसारी
ग़ज़ल
कलीम क़ैसर बलरामपुरी
ग़ज़ल
दिन ढले जैसे ही तेरी याद के साएँ बढ़ें
इस लिए ख़ुद बन के सूरज जगमगाती रात है
रितेश सिंह 'राहिल'
ग़ज़ल
जहाँ की रंगीनियों की हमराज़ आँख पत्थर बनी हुई है
ये हाल अब हो गया है दिल का न रो सकें हम न मुस्कुराएँ