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ग़ज़ल
नज़र के सागरों में जो भरी थी तू ने अर्ग़वाँ
तिरी हसीन आँख से चुरा चुरा के पी गया
सरताज आलम आबिदी
ग़ज़ल
कहीं रंज-ओ-ग़म की तमाज़तें मिरी चश्म-ए-नम को बुझा न दें
मिरी आँख में कोई भर गया कई सागरों को उबाल कर
अशफ़ाक़ शाहीन
ग़ज़ल
सागरों की फूल पीने से हुई मिट्टी ख़राब
जाम-ए-मय बाग़-ए-सुख़न में गुल है गुल में ख़ाक है
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
सब ख़बर होते हुए पीर-ए-मुग़ाँ है बे-ख़बर
तिश्नगी का ग़लग़ला है साग़रों के दरमियाँ
प्रीतपाल सिंह बेताब
ग़ज़ल
अख़्तर ओरेनवी
ग़ज़ल
ज़िंदगी को रात दिन बहते हुए देखा यहाँ तो
सागरों के पानियों को भी रवानी याद आई