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ग़ज़ल
बची-खुची नेकियों को तुम भी उठा के दरिया में डाल देना
किसी भी सालेह अमल का अपने कभी न कोई हिसाब रखना
रऊफ़ सादिक़
ग़ज़ल
हक़-ओ-बातिल के आगे फ़ितरत-ए-सालेह को क्या कहिये
उधर वो मोम होती है इधर फ़ौलाद होती है