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ग़ज़ल
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं
हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं
हबीब जालिब
ग़ज़ल
ये कह सकते हो हम दिल में नहीं हैं पर ये बतलाओ
कि जब दिल में तुम्हीं तुम हो तो आँखों से निहाँ क्यूँ हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं
उस ने वा'दा कर लिया मैं ने भी वा'दा कर लिया
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकता
तुम अच्छा कर नहीं सकते मैं अच्छा हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
अंधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है
किसी का ध्यान आता है उजाला होने लगता है