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ग़ज़ल
हो गया क्या साया-ए-बाल-ए-हुमा साया तिरा
इस क़दर दूर आप को मुझ से न ऐ दीवार खींच
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
'ज़ाकिर' ये ताज-ओ-तख़्त है मंसूब उन के नाम
जिन के सरों पे साया-ए-बाल-ए-हुमा भी है
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
ग़ज़ल
सियह-बख़्ती पे साया गर हो तेरी ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ का
उसे वो अपने सर पे साया-ए-बाल-ए-हुमा समझे
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
ग़ज़ल
शाहों के साथ ये भी है तक़दीर का मज़ाक़
रिज़्क-ए-हुमा हों साया-ए-बाल-ए-हुमा के बा'द