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ग़ज़ल
कू-ए-जानाँ में भी ख़ासा था तरह-दार 'फ़राज़'
लेकिन उस शख़्स की सज-धज थी सर-ए-दार जुदा
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी
सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
देखो ये शहर है अजब दिल भी नहीं है कम ग़ज़ब
शाम को घर जो आऊँ मैं थोड़ा सा सज लिया करो
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की निय्यत ठीक नहीं
निकला न करो तुम सज-धज कर ईमान की निय्यत ठीक नहीं
हसरत जयपुरी
ग़ज़ल
महफ़िलें जो उजड़ गईं सज भी गईं हज़ार बार
मेरा जहान-ए-आरज़ू उजड़ा तो फिर बसा नहीं
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
मिरी ख़ल्वतों की ये जन्नतें कई बार सज के उजड़ गईं
मुझे बारहा ये हुआ गुमाँ कि तुम आ रहे हो कशाँ कशाँ
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा कर ले गया
क्यूँ न मुझ को भी तिरे दर से उठा कर ले गया
अर्श सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
निकली तो हैं सज-धज के तिरी याद की परियाँ
ख़्वाबों के मगर राज दुलारे नहीं निकले