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ग़ज़ल
वो अपनी ख़ल्वत-ए-जाँ से पुकारता है मुझे
मैं चाहता हूँ उसे हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब की तरह
रज़ी अख़्तर शौक़
ग़ज़ल
कहूँ क्या दिल उड़ाने का तिरा कुछ ढब निराला था
वगर्ना हर तरह से अब तलक तो मैं सँभाला था
सैय्यद मोहम्मद मीर असर
ग़ज़ल
मैं सियह-रू अपने ख़ालिक़ से जो ने'मत माँगता
अपना मुँह धोने को पहले आब-ए-ख़जलत माँगता
इमदाद अली बहर
ग़ज़ल
ये भी न पूछा तुम ने 'अंजुम' जीता है या मरता है
वाह-जी-वा आशिक़ से कोई ऐसी ग़फ़लत करता है