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ग़ज़ल
वक़्त सिंघासन पर बैठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते हैं साँसों के उक्तारे लोग
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
कहता है तू कुछ या नहीं 'आसिफ़' से ये तू जान
याँ किस को सुनाता है कि मैं कुछ नहीं कहता
आसिफ़ुद्दौला
ग़ज़ल
छोड़ जाता है तज़ब्ज़ुब में वो मुझ को 'फ़ैसल'
दास्ताँ आधी सुनाता है चला जाता है
फ़ैसल इम्तियाज़ ख़ान
ग़ज़ल
ख़ुद सुनाता है उन्हें मेरी मोहब्बत के ख़ुतूत
फिर भी क़ासिद ने मिरा नाम छुपा रक्खा है