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ग़ज़ल
मंज़िलें गर्द की मानिंद उड़ी जाती हैं
अबलक़-ए-दहर कुछ अंदाज़-ए-तग-ओ-ताज़ तो दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
जी धड़कता है कहीं तार-ए-रग-ए-गुल चुभ न जाए
सेज पर फूलों की करते क़स्द-ए-ख़ुफ़तन आप हैं
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
इस के हल्क़े में तग-ओ-ताज़ की वुसअ'त है बहुत
आहू-ए-शहर मिरी बाँहों की ज़ंजीर में आ
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मैं दोज़ख़-ए-जाँ में भी रहा महव-ए-तग-ओ-ताज़
यूँ कहने को इस 'उम्र का हर लम्हा नया है
अर्श सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
तौसन-ए-नाज़ को फेंके है वो जिस दम सरपट
लोग क्या क्या न तग-ओ-ताज़ में मर जाते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
मैं दोज़ख़-ए-जाँ में भी रहा महव-ए-तग-ओ-ताज़
ऐ ख़ालिक़-ए-अफ़्लाक तुझे तो ये पता है