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ग़ज़ल
दिल-ए-मायूस में वो शोरिशें बरपा नहीं होतीं
उमीदें इस क़दर टूटीं कि अब पैदा नहीं होतीं
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
यही नहीं कि सर-ए-शब क़यामतें टूटीं
सहर के वक़्त भी इन बस्तियों में क्या न हुआ
अख़्तर होशियारपुरी
ग़ज़ल
न यूँ टूटीं न टूटेंगी कभी ज़िंदाँ की दीवारें
कोई सर फोड़ कर मर जाए मर जाने से क्या हासिल
जिगर बरेलवी
ग़ज़ल
चूड़ियाँ टूटीं तो ज़ख़्मों से लहू-रंग हुई
जिस हथेली ने ज़रा रंग-ए-हिना माँगा था
महेंद्र प्रताप चाँद
ग़ज़ल
नाजी शाकिर
ग़ज़ल
हज़ारों बिजलियाँ टूटीं नशेमन भी जला लेकिन
कोई तो है जो इस घर की निगहबानी में रहता है
सिद्दीक़ मुजीबी
ग़ज़ल
किसी आवाज़ ने आवाज़ दी ख़ामोशियाँ टूटीं
जहाँ थीं सिर्फ़ दीवारें वहाँ पर दर निकल आए
रहमान मुसव्विर
ग़ज़ल
जामुनों वाले देस के लड़के, टेढ़े उन के तौर
पँख टटोलें तूतियों के वो, फिर कर हर हर डाल
अली अकबर नातिक़
ग़ज़ल
चूड़ियाँ टूटीं तो ज़ख़्मों से लहू-रंग हुई
जिस हथेली ने ज़रा रंग-ए-हिना माँगा था