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ग़ज़ल
ताकि मैं जानूँ कि है उस की रसाई वाँ तलक
मुझ को देता है पयाम-ए-वादा-ए-दीदार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मिरे गोश-ए-तमन्ना पर भी आख़िर रहम फ़रमाओ
कि मैं हूँ और फ़रेब-ए-वादा-ए-दीदार की हसरत
अब्दुल हादी वफ़ा
ग़ज़ल
'अख़्तर' यक़ीन-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा तो कर लिया
ईफ़ा-ए-'अह्द तक ही जियो तो जिया न जाए
अलीम अख़्तर मुज़फ़्फ़र नगरी
ग़ज़ल
हुस्न के हुस्न-ए-नदामत का तक़ाज़ा है कि आज
सिद्क़-ए-दिल से फिर यक़ीन-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा करूँ