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ग़ज़ल
हुस्न और उस पे हुस्न-ए-ज़न रह गई बुल-हवस की शर्म
अपने पे ए'तिमाद है ग़ैर को आज़माए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त
वाए महरूमी ख़ज़फ़ चैन लब साहिल हूँ मैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मशाम-ए-तेज़ से मिलता है सहरा में निशाँ उस का
ज़न ओ तख़मीं से हाथ आता नहीं आहू-ए-तातारी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तू वो मोती कि समुंदर में भी शो'ला-ज़न था
मैं वो आँसू कि सर-ए-ख़ाक गिराया है मुझे
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
तलब दुनिया को कर के ज़न-मुरीदी हो नहीं सकती
ख़याल-ए-आबरू-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना आता है
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
सरिश्क आशुफ़्ता-सर था क़तरा-ज़न मिज़्गाँ से जाने में
रहे याँ शोख़ी-ए-रफ़्तार से पा आस्ताने में