aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",Bud"
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
हवा भी ख़ुश-गवार हैगुलों पे भी निखार हैतरन्नुम-ए-हज़ार हैबहार पुर-बहार हैकहाँ चला है साक़ियाइधर तो लौट इधर तो आअरे ये देखता है क्याउठा सुबू सुबू उठासुबू उठा प्याला भरप्याला भर के दे इधरचमन की सम्त कर नज़रसमाँ तो देख बे-ख़बरवो काली काली बदलियाँउफ़ुक़ पे हो गईं अयाँवो इक हुजूम-ए-मय-कशाँहै सू-ए-मय-कदा रवाँये क्या गुमाँ है बद-गुमाँसमझ न मुझ को ना-तवाँख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँअभी तो मैं जवान हूँइबादतों का ज़िक्र हैनजात की भी फ़िक्र हैजुनून है सवाब काख़याल है अज़ाब कामगर सुनो तो शैख़ जीअजीब शय हैं आप भीभला शबाब ओ आशिक़ीअलग हुए भी हैं कभीहसीन जल्वा-रेज़ होंअदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ होंहवाएँ इत्र-बेज़ होंतो शौक़ क्यूँ न तेज़ होंनिगार-हा-ए-फ़ित्नागरकोई इधर कोई उधरउभारते हों ऐश परतो क्या करे कोई बशरचलो जी क़िस्सा-मुख़्तसरतुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़रदुरुस्त है तो हो मगरअभी तो मैं जवान हूँये गश्त कोहसार कीये सैर जू-ए-बार कीये बुलबुलों के चहचहेये गुल-रुख़ों के क़हक़हेकिसी से मेल हो गयातो रंज ओ फ़िक्र खो गयाकभी जो बख़्त सो गयाये हँस गया वो रो गयाये इश्क़ की कहानियाँये रस भरी जवानियाँउधर से मेहरबानियाँइधर से लन-तरानियाँये आसमान ये ज़मींनज़ारा-हा-ए-दिल-नशींइन्हें हयात-आफ़रींभला मैं छोड़ दूँ यहींहै मौत इस क़दर क़रींमुझे न आएगा यक़ींनहीं नहीं अभी नहींअभी तो मैं जवान हूँन ग़म कुशूद ओ बस्त काबुलंद का न पस्त कान बूद का न हस्त कान वादा-ए-अलस्त काउम्मीद और यास गुमहवास गुम क़यास गुमनज़र से आस पास गुमहमा-बजुज़ गिलास गुमन मय में कुछ कमी रहेक़दह से हमदमी रहेनशिस्त ये जमी रहेयही हमा-हामी रहेवो राग छेड़ मुतरिबातरब-फ़ज़ा, अलम-रुबाअसर सदा-ए-साज़ काजिगर में आग दे लगाहर एक लब पे हो सदान हाथ रोक साक़ियापिलाए जा पिलाए जाअभी तो मैं जवान हूँ
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरीख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरीये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरीउठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरीउड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरीटपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरीइलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरीमिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ कावो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरीदरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारमज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारमरियाज़-ए-दहर में ना-आश्ना-ए-बज़्म-ए-इशरत हूँख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम-ए-मसर्रत हूँमिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाईमैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँपरेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलतासिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत कासरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त-ए-ख़ाक-ए-सहरा नेकिसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँनज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए-हस्तीमैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँन सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमानामैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँमुझे राज़-ए-दो-आलम दिल का आईना दिखाता हैवही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता हैअता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों मेंकि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों मेंअसर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ कामिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों मेंरुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ कोकि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों मेंदिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोयालिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों मेंनिशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचींतिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों मेंछुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं नेअनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों मेंसुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस कोवज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों मेंवतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली हैतिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों मेंज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला हैधरा क्या है भला अहद-ए-कुहन की दास्तानों मेंये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा करज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों मेंन समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालोतुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों मेंयही आईन-ए-क़ुदरत है यही उस्लूब-ए-फ़ितरत हैजो है राह-ए-अमल में गामज़न महबूब-ए-फ़ितरत हैहुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगालहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगाजलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ सेतिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगामगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना पैदाचमन में मुश्त-ए-ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगापिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों कोजो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगामुझे ऐ हम-नशीं रहने दे शग़्ल-ए-सीना-कावी मेंकि मैं दाग़-ए-मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगादिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा हैतुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगाजो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती हैज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती हैकिया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू नेगुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा तू नेरहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों कोकिया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू नेफ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं परमगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू नेतअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने मेंये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू नेसरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जासपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू नेसफ़ा-ए-दिल को क्या आराइश-ए-रंग-ए-तअल्लुक़ सेकफ़-ए-आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू नेज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू नेज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिलबनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू नेकुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखाअरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू नेहवस बाला-ए-मिम्बर है तुझे रंगीं-बयानी कीनसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना-ख़्वानी कीदिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम कोजो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम कोज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल-हवस मक़्सद नहीं उस काबनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म-ए-आदम कोअगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखानज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम कोशजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस काये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम कोन उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भीये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम कोफिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ मेंये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम कोमोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता हैज़रा से बीज से पैदा रियाज़-ए-तूर होता हैदवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए-आरज़ू रहनाइलाज-ए-ज़ख़्म है आज़ाद-ए-एहसान-ए-रफ़ू रहनाशराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरीशिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहनाथमे क्या दीदा-ए-गिर्यां वतन की नौहा-ख़्वानी मेंइबादत चश्म-ए-शाइर की है हर दम बा-वज़ू रहनाबनाएँ क्या समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशियाँ अपनाचमन में आह क्या रहना जो हो बे-आबरू रहनाजो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत मेंग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहनाये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र कोतुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहनान रह अपनों से बे-परवा इसी में ख़ैर है तेरीअगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना-ख़ू रहनाशराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ कीसिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहनामोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों नेकिया है अपने बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों नेबयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी हैये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी हैमोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी हैमरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसाछुपा जिस में इलाज-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन भी हैजलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जानाये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम-ए-अंजुमन भी हैवही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय मेंये शीरीं भी है गोया बे-सुतूँ भी कोहकन भी हैउजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों कोमिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी हैसुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्नाज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी हैनमी-गर्दीद को तह रिश्ता-ए-मअ'नी रिहा कर्दमहिकायत बूद बे-पायाँ ब-ख़ामोशी अदा कर्दम
1ये शाम इक आईना-ए-नील-गूँ ये नम ये महकये मंज़रों की झलक खेत बाग़ दरिया गाँववो कुछ सुलगते हुए कुछ सुलगने वाले अलावसियाहियों का दबे-पाँव आसमाँ से नुज़ूललटों को खोल दे जिस तरह शाम की देवीपुराने वक़्त के बरगद की ये उदास जटाएँक़रीब ओ दूर ये गो धूल की उभरती घटाएँये काएनात का ठहराव ये अथाह सुकूतये नीम-तीरह फ़ज़ा रोज़-ए-गर्म का ताबूतधुआँ धुआँ सी ज़मीं है घुला घुला सा फ़लक2ये चाँदनी ये हवाएँ ये शाख़-ए-गुल की लचकये दौर-ए-बादा ये साज़-ए-ख़मोश फ़ितरत केसुनाई देने लगी जगमगाते सीनों मेंदिलों के नाज़ुक ओ शफ़्फ़ाफ़ आबगीनों मेंतिरे ख़याल की पड़ती हुई किरन की खनक3ये रात छनती हवाओं की सोंधी सोंधी महकये खेत करती हुई चाँदनी की नर्म दमकसुगंध रात की रानी की जब मचलती हैफ़ज़ा में रूह-ए-तरब करवटें बदलती हैये रूप सर से क़दम तक हसीन जैसे गुनाहये आरिज़ों की दमक ये फ़ुसून-ए-चश्म-ए-सियाहये धज न दे जो अजंता की सनअतों को पनाहये सीना पड़ ही गई देव लोक की भी निगाहये सर-ज़मीन से आकाश की परस्तिश-गाहउतारते हैं तिरी आरती सितारा ओ माहसजल बदन की बयाँ किस तरह हो कैफ़िय्यतसरस्वती के बजाते हुए सितार की गतजमाल-ए-यार तिरे गुल्सिताँ की रह रह केजबीन-ए-नाज़ तिरी कहकशाँ की रह रह केदिलों में आईना-दर-आईना सुहानी झलक4ये छब ये रूप ये जोबन ये सज ये धज ये लहकचमकते तारों की किरनों की नर्म नर्म फुवारये रसमसाते बदन का उठान और ये उभारफ़ज़ा के आईना में जैसे लहलहाए बहारये बे-क़रार ये बे-इख़्तियार जोश-ए-नुमूदकि जैसे नूर का फ़व्वारा हो शफ़क़-आलूदये जल्वे पैकर-ए-शब-ताब के ये बज़्म-ए-शोहूदये मस्तियाँ कि मय-ए-साफ़-ओ-दुर्द सब बे-बूदख़जिल हो लाल-ए-यमन उज़्व उज़्व की वो डलक5बस इक सितारा-ए-शिंगरफ़ की जबीं पे झमकवो चाल जिस से लबालब गुलाबियाँ छल्केंसकूँ-नुमा ख़म-ए-अबरू ये अध-खुलीं पलकेंहर इक निगाह से ऐमन की बिजलियाँ लपकेंये आँख जिस में कई आसमाँ दिखाई पड़ेंउड़ा दें होश वो कानों की सादा सादा लवेंघटाएँ वज्द में आएँ ये गेसुओं की लटक6ये कैफ़-ओ-रंग-ए-नज़ारा ये बिजलियों की लपककि जैसे कृष्ण से राधा की आँख इशारे करेवो शोख़ इशारे कि रब्बानियत भी जाए झपकजमाल सर से क़दम तक तमाम शोला हैसुकून जुम्बिश ओ रम तक तमाम शोला हैमगर वो शोला कि आँखों में डाल दे ठंडक7ये रात नींद में डूबे हुए से हैं दीपकफ़ज़ा में बुझ गए उड़ उड़ के जुगनुओं के शरारकुछ और तारों की आँखों का बढ़ चला है ख़ुमारफ़सुर्दा छिटकी हुई चाँदनी का धुँदला ग़ुबारये भीगी भीगी उदाहट ये भीगा भीगा नूरकि जैसे चश्मा-ए-ज़ुल्मात में जले काफ़ूरये ढलती रात सितारों के क़ल्ब का ये गुदाज़ख़ुनुक फ़ज़ा में तिरा शबनमी तबस्सुम-ए-नाज़झलक जमाल की ताबीर ख़्वाब आईना-साज़जहाँ से जिस्म को देखें तमाम नाज़-ओ-नियाज़जहाँ निगाह ठहर जाए राज़-अंदर-राज़सुकूत-ए-नीम-शबी लहलहे बदन का निखारकि जैसे नींद की वादी में जागता संसारहै बज़्म-ए-माह कि परछाइयों की बस्ती हैफ़ज़ा की ओट से वो ख़ामुशी बरसती हैकि बूँद बूँद से पैदा हो गोश ओ दिल में खनक8किसी ख़याल में है ग़र्क़ चाँदनी की चमकहवाएँ नींद के खेतों से जैसे आती होंहयात ओ मौत में सरगोशियाँ सी होती हैंकरोड़ों साल के जागे सितारे नम-दीदासियाह गेसुओं के साँप नीम-ख़्वाबीदाये पिछली रात ये रग रग में नर्म नर्म कसक
ये बरहनगी जिसे देख कर बढ़ें दस्त ओ पा न खुले ज़बाँन ख़याल ही में रहे तवाँतो वो रेग-ज़ार कि जैसे रह-ज़न-ए-पीर होजिसे ताब-ए-राह-ज़नी न होकि मिसाल-ए-त़ाएर-ए-नीम-जाँजिसे याद-ए-बाल-ओ-परी न होकिसी राह-रौ से उमीद-ए-रहम-ओ-करम लिएमैं भरा हुआ हूँ समुंदरों के जलाल सेचला आ रहा हूँ मैं साहिलों का हशम लिएहै अभी इन्ही की तरफ़ मिरा दर-ए-दिल खुलाकि नसीम-ए-ख़ंदा को रह मिलेमिरी तीरगी को निगह मिलेवो सुरूर-ओ-सोज़-ए-सदफ़ अभी मुझे याद हैअभी चाटती है समुंदरों की ज़बाँ मुझेमिरे पाँव छू के निकल गई कोई मौज-ए-साज़ ब-कफ़ अभीवो हलावतें मिरे हस्त ओ बूद में भर गईंवो जज़ीरे जिन के उफ़ुक़ हुजूम-ए-सहर से दीद-बहार थेवो परिंदे अपनी तलब में जो सर-ए-कार थेवो परिंदे जिन की सफ़ीर में थीं रिसालातेंअभी उस सफ़ीर की जल्वतें मिरे ख़ूँ में हैंअभी ज़ेहन है वो सनम लिएजो समुंदरों के फ़ुसूँ में हैंचला आ रहा हूँ समुंदरों के जमाल सेसदफ़ ओ कनार का ग़म लिए
मर्ग-ए-इस्राफ़ील पर आँसू बहाओवो ख़ुदाओं का मुक़र्रब वो ख़ुदावंद-ए-कलामसौत-ए-इंसानी की रूह-ए-जावेदाँआसमानों की निदा-ए-बे-कराँआज साकित मिस्ल-ए-हर्फ़-ए-ना-तमाममर्ग-ए-इस्राफ़ील पर आँसू बहाओआओ इस्राफ़ील के इस ख़्वाब-ए-बे-हंगाम पर आँसू बहाएँआर्मीदा है वो यूँ क़र्ना के पासजैसे तूफ़ाँ ने किनारे पर उगल डाला उसेरेग-ए-साहिल पर चमकती धूप में चुप चापअपने सूर के पहलू में वो ख़्वाबीदा हैउस की दस्तार उस के गेसू उस की रीशकैसे ख़ाक-आलूदा हैंथे कभी जिन की तहें बूद-ओ-नबूदकैसे इस का सूर इस के लब से दूरअपनी चीख़ों अपनी फ़रियादों में गुमझिलमिला उठते थे जिस से दैर-ओ-ज़ूदमर्ग-ए-इस्राफ़ील पर आँसू बहाओवो मुजस्सम हमहमा था वो मुजस्सम ज़मज़मावो अज़ल से ता अबद फैली हुई ग़ैबी सदाओं का निशाँमर्ग-ए-इस्राफ़ील सेहल्क़ा दर हल्क़ा फ़रिश्ते नौहा गरइब्न-ए-आदम ज़ुल्फ़-दर-ख़ाक-ओ-नज़ारहज़रत-ए-यज़्दाँ की आँखें ग़म से तारआसमानों की सफ़ीर आती नहींआलम-ए-लाहूत से कोई नफ़ीर आती नहींमर्ग-ए-इस्राफ़ील सेइस जहाँ पर बंद आवाज़ों का रिज़्क़मुतरिबों का रिज़्क़ और साज़ों का रिज़्क़अब मुग़न्नी किस तरह गाएगा और गाएगा क्यासुनने वालों के दिलों के तार चुपअब कोई रक़्क़ास क्या थिरकेगा लहराएगा क्याबज़्म के फ़र्श-ओ-दर-ओ-दीवार चुपअब ख़तीब-ए-शहर फ़रमाएगा क्यामस्जिदों के आस्तान-ओ-गुम्बद-ओ-मीनार चुपफ़िक्र का सय्याद अपना दाम फैलाएगा क्याताइरान-ए-मंज़िल-ओ-कोहसार चुपमर्ग-ए-इस्राफ़ील हैगोश-ए-शनवा की लब-ए-गोया की मौतचश्म-ए-बीना की दिल-ए-दाना की मौतथी इसी के दम से दरवेशों की सारी हाव-हूअहल-ए-दिल की अहल-ए-दिल से गुफ़्तुगूअहल-ए-दिल जो आज गोशा-गीर-ओ-सुर्मा-दर-गुलूअब तना ता-हू भी ग़ाएब और या-रब हा भी गुमअब गली कूचों की हर आवा भी गुमये हमारा आख़िरी मलजा भी गुममर्ग-ए-इस्राफ़ील सेइस जहाँ का वक़्त जैसे सो गया पथरा गयाजैसे कोई सारी आवाज़ों को यकसर खा गयाऐसी तन्हाई कि हुस्न-ए-ताम याद आता नहींऐसा सन्नाटा कि अपना नाम याद आता नहींमर्ग-ए-इस्राफ़ील सेदेखते रह जाएँगे दुनिया के आमिर भीज़बाँ-बंदी के ख़्वाबजिस में मजबूरों की सरगोशी तो होउस ख़ुदावंदी के ख़्वाब
नीम-शब चाँद ख़ुद-फ़रामोशीमहफ़िल-ए-हस्त-ओ-बूद वीराँ हैपैकर-ए-इल्तिजा है ख़ामोशीबज़्म-ए-अंजुम फ़सुर्दा-सामाँ हैआबशार-ए-सुकूत जारी हैचार-सू बे-ख़ुदी सी तारी हैज़िंदगी जुज़व-ए-ख़्वाब है गोयासारी दुनिया सराब है गोयासो रही है घने दरख़्तों पर!चाँदनी की थकी हुई आवाज़कहकशाँ नीम-वा निगाहों सेकह रही है हदीस-ए-शौक़-ए-नियाज़साज़-ए-दिल के ख़मोश तारों सेछन रहा है ख़ुमार-ए-कैफ़-आगींआरज़ू ख़्वाब तेरा रू-ए-हसीं
ऐ आफ़्ताब रूह-ओ-रवान-ए-जहाँ है तूशीराज़ा-बंद दफ़्तर-ए-कौन-ओ-मकाँ है तूबाइ'स है तू वजूद-ओ-अदम की नुमूद काहै सब्ज़ तेरे दम से चमन हस्त-ओ-बूद काक़ाएम ये उंसुरों का तमाशा तुझी से हैहर शय में ज़िंदगी का तक़ाज़ा तुझी से हैहर शय को तेरी जल्वा-गरी से सबात हैतेरा ये सोज़-ओ-साज़ सरापा हयात हैवो आफ़्ताब जिस से ज़माने में नूर हैदिल है ख़िरद है रूह-ए-रवाँ है शुऊर हैए आफ़्ताब हम को ज़िया-ए-शुऊर देचश्म-ए-ख़िरद को अपनी तजल्ली से नूर देहै महफ़िल-ए-वजूद का सामाँ-तराज़ तोयज़्दान-ए-साकिनान-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ तूतेरा कमाल-ए-हस्ती हर जान-दार मेंतेरी नुमूद सिलसिला-ए-कोहसार मेंहर चीज़ की हयात का परवरदिगार तूज़ाईदन-ए-नूर का है ताजदार तूनय इब्तिदा कोई न कोई इंतिहा तिरीआज़ाद क़ैद-ए-अव्वल-ओ-आख़िर ज़िया तिरी
फूलों पे रक़्स और न बहारों पे रक़्स करगुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद में ख़ारों पे रक़्स करहो कर जुमूद-ए-गुलशन-ए-जन्नत से बे-नियाज़दोज़ख़ के बे-पनाह शरारों पे रक़्स करशम-ए-सहर फुसून-ए-तबस्सुम, हयात-ए-गुलफ़ितरत के इन अजीब नज़ारों पे रक़्स करतंज़ीम-ए-काएनात-ए-जुनूँ की हँसी उड़ाउजड़े हुए चमन की बहारों पे रक़्स करसहमी हुई सदा-ए-दिल-ए-ना-तवाँ न सुनबहकी हुई नज़र के इशारों पर रक़्स करजो मर के जी रहे थे तुझे उन से क्या ग़रज़तू अपने आशिक़ों के मज़ारों पे रक़्स करहर हर अदा हो रूह की गहराइयों में गुमयूँ रंग-ओ-बू की राह-गुज़ारों पे रक़्स करतू अपनी धुन में मस्त है तुझ को बताए कौनतेरी ज़मीं फ़लक है सितारों पर रक़्स करइस तरह रक़्स कर कि सरापा असर हो तूकोई नज़र उठाए तो पेश-ए-नज़र हो तू
सेहन-ए-जहाँ में रक़्स-कुनाँ हैं तबाहियाँआक़ा-ए-हस्त-ओ-बूद की सनअत-गरी की ख़ैर
चमन में लाई है फूलों की आरज़ू तुझ कोमिला कहाँ से ये एहसास-ए-रंग-ओ-बू तुझ कोतिरी तरह कोई सर-गश्ता-ए-जमाल नहींगुलों में महव है काँटों का कुछ ख़याल नहींख़िज़ाँ का ख़ौफ़ न है बाग़बाँ का डर तुझ कोमआल-ए-कार का भी कुछ ख़तर नहीं तुझ कोख़ुश-ए'तिक़ाद ओ ख़ुश-आहंग ख़ुश-नवा बुलबुलजिगर के दाग़ को पुर-नूर कर दिया किस नेतुझे इस आग से मामूर कर दिया किस नेये दिल ये दर्द ये सौदा कहाँ से लाई हैकहाँ की तू ने ये तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ उड़ाई है
अंदलीबों को मिली आह-ओ-बुका की तालीमऔर परवानों को दी सोज़-ए-वफ़ा की तालीमजब हर इक चीज़ को क़ुदरत ने अता की तालीमआई हिस्से में तिरे ज़ौक़-ए-फ़ना की तालीमनर्म ओ नाज़ुक तुझे आज़ा दिए जलने के लिएदिल दिया आग के शोलों पे पिघलने के लिएरंग तस्वीर के पर्दे में जो चमका तेराख़ुद-ब-ख़ुद लूट गया जल्वा-ए-राना तेराढाल कर काल-बुद-ए-नूर में पुतला तेरायद-ए-क़ुदरत ने बनाया जो सरापा तेराभर दिया कूट के सोज़-ए-ग़म-ए-शौहर दिल मेंरख दिया चीर के इक शोला-ए-मुज़्तर दिल मेंतू वो थी शम्अ कि परवाना बनाया तुझ कोतू वो लैला थी कि दीवाना बनाया तुझ कोरौनक़-ए-ख़ल्वत-ए-शाहाना बनाया तुझ कोनाज़िश-ए-हिमात-ए-मर्दाना बनाया तुझ कोनाज़ आया तिरे हिस्से में अदा भी आईजाँ-फ़रोशी भी, मोहब्बत भी, वफ़ा भी, आईआई दुनिया में जो तू हुस्न में यकता बन करचमन-ए-दहर में फूली गुल-ए-राना बन कररही माँ बाप की आँखों का जो तारा बन करदिल-ए-शौहर में रही ख़ाल-ए-सुवैदा बन करहुस्न-ए-ख़िदमत से शगुफ़्ता दिल-ए-शौहर रक्खाकि क़दम जादा-ए-ताअत से न बाहर रक्खातेरी फ़ितरत में मुरव्वत भी थी ग़म-ख़्वारी भीतेरी सूरत में अदा भी तरह-दारी भीजल्वा-ए-हुस्न में शामिल थी निको-कारी भीदर्द आया तिरे हिस्से में, तो ख़ुद्दारी भीआग पर भी न तुझे आह मचलते देखातपिश-ए-हुस्न को पहलू न बदलते देखातू वो इस्मत की थी ओ आईना-सीमा तस्वीरहुस्न-ए-सीरत से थी तेरी मुतजला तस्वीरलाख तस्वीरों से थी इक तिरी ज़ेबा तस्वीरतुझ को क़ुदरत ने बनाया था सरापा तस्वीरनूर ही नूर तिरे जल्वा-ए-मस्तूर में थाअंजुम-ए-नाज़ का झुरमुट रुख़-ए-पुर-नूर में थालब में एजाज़ हया चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़ में थीकि क़यामत की अदा तेरे हर अंदाज़ में थीशक्ल फिरती जो तिरी दीदा-ए-ग़म्माज़ में थीबर्क़-ए-बेताब तिरी जल्वा-गाह-ए-नाज़ में थीये वो बिजली थी क़यामत की तड़प थी जिस मेंशोला-ए-नार-ए-उक़ूबत की तड़प थी जिस मेंये वो बिजली थी जो तेग़-ए-शरर-अफ़्शाँ हो करकौंद उठी क़िला-ए-चित्तौड़ में जौलाँ हो करये वो बिजली थी जो सोज़-ए-ग़म-ए-हिर्मां हो करख़ाक सी लोट गई तेरी पशीमाँ हो करये वो बिजली थी तुझे जिस के असर ने फूँकारफ़्ता रफ़्ता तपिश-ए-सोज़-ए-जिगर ने फूँकाआह ओ इश्वा ओ अंदाज़ ओ अदा की देवीआह ओ हिन्द के नामूस-ए-वफ़ा की देवीआह ओ परतव-ए-अनवार-ए-सफ़ा की देवीओ ज़ियारत-कदा-ए-शर्म-ओ-हया की देवीतेरी तक़्दीस का क़ाएल है ज़माना अब तकतेरी इफ़्फ़त का ज़बाँ पर है फ़साना अब तकआफ़रीं है तिरी जाँ-बाज़ी ओ हिम्मत के लिएआफ़रीं है तिरी इफ़्फ़त तिरी इस्मत के लिएक्या मिटाएगा ज़माना तिरी शोहरत के लिएकि चली आती है इक ख़ल्क़ ज़ियारत के लिएनक़्श अब तक तिरी अज़्मत का है बैठा दिल मेंतू वो देवी है, तिरा लगता है मेला दिल में
फ़ारसी हिन्दी की आमेज़िश से है इस का वजूदयादगार-ए-इत्तिहाद-ए-अहल-ए-इस्लाम-ओ-हनूदधूप छाँ के रंग की है वो क़बा-ए-हस्त-ओ-बूदकार-गाह-ए-हिंद से मंसूब जिस के तार-ओ-पूदसुफ़्त-ओ-संगीँ या लिबास-ए-आरियत बारीक हैजामा-ज़ेबी से क़द-ए-मौज़ूँ पर इस के ठीक है
हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुएमचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद
सुब्ह-सवेरेवो बिस्तर से साए जैसी उठती हैफिर चूल्हे में रात की ठंडी आग कोरौशन करती हैइतने में दिन चढ़ जाता हैजल्दी जल्दी चाय बना कर शौहर को रुख़्सत करती हैसय्यारे गर्दिश करते हैंशहर में सहरा सहराओं में चटयल मैदाँकोहसारों के नशेब-ओ-फ़राज़ बना करते हैंसारे घर को धोती हैकपड़े तौलिए टूथ-ब्रश बिस्तर की चादरकोई किताब उठाती है रख देती हैरेडियो ऑन किया फिर रोका ऑन कियाफिर कोई पुराना ख़त पढ़ती है(घंटी बजी)''मर्यम! आ जाओ''''तुम कैसी हो? वो कैसे हैं''''क्या उस का कोई ख़त आया?''(थोड़ी ख़ामोशी का वक़्फ़ा)''तुम कैसी हो''''तुम से मतलब? सच कह दूँ तो क्या कर लोगी''देखो सब की सब बैठी हों''अच्छा''''अच्छा''(दरवाज़ा फिर बंद हो गया)''अब क्या करना!घर तो बिल्कुल साफ़ पड़ा हैकोई शिकन बिस्तर पे नहीं हैदीवार-ओ-दर धुले-धुलाएकोई धब्बा या मकड़ी का जाला तिनकाकहीं कुछ नहींक्या करना है!उफ़! वो कैलेंडरकितने बरस हो गए फिर भीआएँ तो उन से कहती हूँबिल्कुल नया कैलेंडर लाएँकुछ भूक नहींअब क्या करना हैलेट रहूँ? लेकिन क्या लेटूँजाने कितना लेट चुकी हूँखड़ी रहूँहाँ खड़ी रहूँपर मैं तो कब से खड़ी हुई हूँखिड़की का पर्दा ही खोलूँधूप कहाँ तक आ पहुँची हैलाओ अपना एल्बम देखूँनय्यर शबनम शफ़क़ सुबूही अख़्तर जूहीकैसे होंगेआँ! ये मैं हूँइत्ती प्यारी प्यारी थी मैंमैं बिल्कुल ही भूल गई थीसब कितना अच्छा लगता थाअब्बा, अम्माँ, भय्या, अप्पीसब ज़िंदा थेसाया नानी गुलशन आपाहाँ और वो गौरय्या बाबाआँसू नग़्मे शोर ठहाके सारे इक सुर में होते थेसारी दुनिया घर लगती थीअमाँ उधर बुलाया करतींअब्बा उधर पुकारा करतेभय्या डाँटतेअप्पी ढेरों प्यार जतातींखाना, पीना, सोना, जागना, हँसना, रूठना, मननाडोर बंधी थीएक में एक पिरोया हुआ थाकल नम्मू के घर शादी हैपास ही कोई मौत हुई हैकॉलेज की छटी कब होगीईद फिर अब की तीस की होगीहम भी लैल-ए-क़द्र जागेंगेशहला की मँगनी क्यूँ टूटी?क्या इक़बाल कोई शाएर था?चुप बड़के अब्बा सुन लेंगेसाए दौड़ रहे हैं घर मेंहर गोशे में ऊपर नीचे अंदर बाहर दौड़ रहे हैंलम्बे छोटे सब्ज़ ओ ज़र्द हज़ारों साएबाहर शहर में कोई नहीं हैधूप सियह पड़ती जाती हैक़द्द-ए-आदम आईने मेंउस का नंगा जिस्म खड़ा हैजिस्म के अंदर सूरज का ग़ुंचा महका हैसय्यारे गर्दिश करते हैंसब अनजाने सय्यारों में भूले-बिसरे घर रौशन हैंकिस लम्हे का है ये तमाशाहस्त-ओ-बूद के सन्नाटे मेंला-मौजूद की तारीकी मेंसिर्फ़ यही आईना रौशनसिर्फ़ इक अक्स-ए-गुज़िश्ता रौशनबिछड़े घर का साया रौशन
बहर-ए-मौजूद के मरकज़ सेइक मौज-ए-तलातुम-ख़ेज़ उट्ठीइक दर्द की लहर उठी दिल के रौज़न सेजिस में सिमट गएदोनों आलम के रंज ओ तरबऔर हस्त-ओ-बूद के महवर पररंज ओ राहत हम-रक़्स हुए
रुस्तगार अज़-पंजा-ए-बेदर्दी-ए-लैल-ओ-नहारबंद आँखों के नगर मेंकैफ़-ए-आलमगीर का अरमाँ मिलाजिस से वावैला नशेबों का न टकराया कभीवो औज-ए-बामसरसरी उस से गुज़र जाने में पिन्हाँ आफ़ियतऐ रह-नवर्दऐ नज़र-वर ऐ दिल-आसारौज़न-ए-ज़ुल्मात हस्त-ओ-बूदऐ पैक-ए-जहाँ-पैमा ख़िज़र
इक शहर था इक बाग़ थाइक शहर थाया ताज़ा मेवों से लदा इक बाग़ थाइक बाग़ थाया शोख़ रंगों से भरा बाज़ार थाबाज़ार था या जुगनुओं की रौशनी से खेलती इक रात थीइक रात थीया गुनगुनाती झूमतीनग़्मात की बारिश में भीगीवस्ल की सौग़ात थीइक शहर था इक बाग़ था इक रात थीऔर उन के दामन मेंबहार-ए-वस्ल की सौग़ात थीइक रोज़ रंग-ओ-नूर के मौसम कोबाद-ए-शुर्त उड़ा कर ले गईइक मौज-ए-ख़ूँ कहिए उसेउस शहर के उस बाग़ केनाम-ओ-निशाँ सारे बहा कर ले गईऐ नौहागरऐ राक़िम-ए-अफ़साना-ए-ज़ेर-ओ-ज़बरऐ चश्म-ए-हैरत चश्म-ए-तरइबरत की जा है किस क़दरअब याद का है एक अफ़्सुर्दा नगरइस शहर मेंकुछ देर को ठहरें ज़रानौहा करेंक़िस्सा लिखेंतारीख़ के औराक़ मेंइक बाब खोलें याद कातक़दीर-ए-हस्त-ओ-बूद कामग़्मूम अफ़्साना लिखें
ज़ेहन जब तक हैख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैहोंट जब तक हैंसवालात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैबहस करते रहो लिखते रहो नज़्में ग़ज़लेंज़ेहन पर सदियों से तारी है जो मज्लिस की फ़ज़ाइस ख़ुनुक आँच से क्या पिघलेगीसोच लेने ही से हालात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैनींद में डूबी हुई आँखों से वाबस्ता ख़्वाबतेज़ किरनों की सिनानों पे ही रुस्वा सर-ए-आमये शहीद अपनी सलीबों से पलट आते हैं दिल में हर शामसुब्ह होती है मगर रात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैदिन गुज़र जाता है बे-फ़ैज़ कद-ओ-काविश मेंएक अन-देखे जहन्नम की तब-ओ-ताबिश मेंजिस्म और जाँ की तग-ओ-ताज़ की हर पुर्सिश मेंदर्द-ओ-ग़म हसरत-ओ-महरूमी की हर काहिश मेंतलब-ओ-तर्क-ए-तलब सिलसिला-ए-बे-पायाँमर्ग ही ज़ीस्त का उन्वान है हर ख़ून-शुदा ख़्वाहिश मेंग़म से भागें भी तो फ़र्याद-ओ-शिकायात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैवक़्त वो दौलत-ए-नायाब है आता नहीं हाथहम मशीनों की तरह जीते हैं पाबंदी-ए-औक़ात के साथवक़्त बे-कार गुज़रता ही चला जाता हैकुर्सियों मेज़ों से बे-मा'नी मुलाक़ातों मेंसैंकड़ों बार की अगली हुई दोहराई हुई बातों मेंमंदगी रहने की तमन्ना की मुदारातों मेंशिकम-ओ-जाँ की इबादात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैसुब्ह से शाम तलक इतने ख़ुदा मिलते हैं हर काफ़िर कोसज्दा-ए-शुक्र से इंकार की मोहलत नहीं मिलने पातीसैंकड़ों लाखों ख़ुदाओं की नज़र से छुप करख़ुद से मिल लेने की रुख़्सत नहीं मिलने पातीख़ुद-परस्तों से भी ताआत की ज़ंजीर कहाँ कटती हैरात आती है तो दिल कहता है हम अपने हैंख़ल्वत-ए-ख़्वाब में दुनिया से किनारा कर लेंकल भी देना है लहू अपना दिल-ओ-दीदा की झोली भर लेंजिस्म के शोर से और रूह की फ़रियाद से दम घुटता हैदिन के बे-कार ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैबे-नियाज़ाना भी जीना है फ़क़त एक गुमाँफ़िक्र-ए-मौजूद को छोड़ें तो ग़म-ए-ना-मौजूदसाथ हर साँस के है सिलसिला-ए-हसत-ओ-बूदग़म-ए-आफ़ाक़ को ठुकराएँ करें तर्क-ए-जहाँफिर भी ये फ़िक्र कि जीने का हो कोई उनवाँबे-नियाज़ी से ग़म-ए-ज़ात की ज़ंजीर कहाँ कटती हैज़ेहन में अंधे अक़ीदों की सियाही भर लोताकि इस नगरी मेंकभी अफ़्कार के शो'लों का गुज़र हो न सकेजब्र का हुक्म सुनोहोंटों को अपने सी लोताकि उन राहों सेकभी लफ़्ज़ों का सफ़र हो न सकेज़ेहन-ओ-लब फिर भी नहीं चुप होतेउन के ख़ामोश सवालात कीपेच-दर-पेच ख़यालात कीज़ंजीर कहाँ कटती है
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books