aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखीयास-ओ-हिरमान के दुख-दर्द के मअ'नी सीखेज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखासर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे
हवा भी ख़ुश-गवार हैगुलों पे भी निखार हैतरन्नुम-ए-हज़ार हैबहार पुर-बहार हैकहाँ चला है साक़ियाइधर तो लौट इधर तो आअरे ये देखता है क्याउठा सुबू सुबू उठासुबू उठा प्याला भरप्याला भर के दे इधरचमन की सम्त कर नज़रसमाँ तो देख बे-ख़बरवो काली काली बदलियाँउफ़ुक़ पे हो गईं अयाँवो इक हुजूम-ए-मय-कशाँहै सू-ए-मय-कदा रवाँये क्या गुमाँ है बद-गुमाँसमझ न मुझ को ना-तवाँख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँअभी तो मैं जवान हूँइबादतों का ज़िक्र हैनजात की भी फ़िक्र हैजुनून है सवाब काख़याल है अज़ाब कामगर सुनो तो शैख़ जीअजीब शय हैं आप भीभला शबाब ओ आशिक़ीअलग हुए भी हैं कभीहसीन जल्वा-रेज़ होंअदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ होंहवाएँ इत्र-बेज़ होंतो शौक़ क्यूँ न तेज़ होंनिगार-हा-ए-फ़ित्नागरकोई इधर कोई उधरउभारते हों ऐश परतो क्या करे कोई बशरचलो जी क़िस्सा-मुख़्तसरतुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़रदुरुस्त है तो हो मगरअभी तो मैं जवान हूँये गश्त कोहसार कीये सैर जू-ए-बार कीये बुलबुलों के चहचहेये गुल-रुख़ों के क़हक़हेकिसी से मेल हो गयातो रंज ओ फ़िक्र खो गयाकभी जो बख़्त सो गयाये हँस गया वो रो गयाये इश्क़ की कहानियाँये रस भरी जवानियाँउधर से मेहरबानियाँइधर से लन-तरानियाँये आसमान ये ज़मींनज़ारा-हा-ए-दिल-नशींइन्हें हयात-आफ़रींभला मैं छोड़ दूँ यहींहै मौत इस क़दर क़रींमुझे न आएगा यक़ींनहीं नहीं अभी नहींअभी तो मैं जवान हूँन ग़म कुशूद ओ बस्त काबुलंद का न पस्त कान बूद का न हस्त कान वादा-ए-अलस्त काउम्मीद और यास गुमहवास गुम क़यास गुमनज़र से आस पास गुमहमा-बजुज़ गिलास गुमन मय में कुछ कमी रहेक़दह से हमदमी रहेनशिस्त ये जमी रहेयही हमा-हामी रहेवो राग छेड़ मुतरिबातरब-फ़ज़ा, अलम-रुबाअसर सदा-ए-साज़ काजिगर में आग दे लगाहर एक लब पे हो सदान हाथ रोक साक़ियापिलाए जा पिलाए जाअभी तो मैं जवान हूँ
ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि सोगवार हो तूसकूँ की नींद तुझे भी हराम हो जाएतिरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जाएतिरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाएग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेराहुजूम-ए-यास से बेताब हो के रह जाएवुफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब होके रह जाएतिरा शबाब फ़क़त ख़्वाब हो के रह जाएग़ुरूर-ए-हुस्न सरापा नियाज़ हो तेरातवील रातों में तू भी क़रार को तरसेतिरी निगाह किसी ग़म-गुसार को तरसेख़िज़ाँ-रसीदा तमन्ना बहार को तरसेकोई जबीं न तिरे संग-ए-आस्ताँ पे झुकेकि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करेफ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्दा पे ए'तिमाद करेख़ुदा वो वक़्त न लाए कि तुझ को याद आएवो दिल कि तेरे लिए बे-क़रार अब भी हैवो आँख जिस को तिरा इंतिज़ार अब भी है
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलामइज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भीदिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहालख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़यालदेखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हालसकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलालतन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग हैक्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाहनूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाहजुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आहली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राहचेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगाआख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुलाअफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुलाइक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुलावा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुलादर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से 'अयाँ हुआरो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँमैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँसब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँलेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँकिस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँजोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँदुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीदअंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीदअंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीदलिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्तेफैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्तेलेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कममैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज कोकिन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहालपूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बालछटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्तेक्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्तेऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़रघर जिन के बे-चराग़ रहे आह 'उम्र भररहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समरये जा-ए-सब्र थी कि दु'आ में नहीं असरलेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गयासरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाहमंजधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राहअब याँ से कूच हो तो 'अदम में मिले पनाहतक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करेसुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाएनाशाद हम को देख के माँ और मर न जाएफिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूरसदमा ये शाक़ 'आलम-ए-पीरी में है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूरशायद ख़िज़ाँ से शक्ल 'अयाँ हो बहार कीकुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार कीये जा'ल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शरहोना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सरअस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़रक्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गरख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहींमंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहींराहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशारवाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगारतुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गारमातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवारसख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहींदुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
चंद कलियाँ नशात की चुन करमुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँतेरा मिलना ख़ुशी की बात सहीतुझ से मिल कर उदास रहता हूँ
नए शुऊर की है रौशनी निगाहों मेंइक आग सी भी है अब अपनी सर्द आहों मेंखिलेंगे फूल नज़र के सहर की बाँहों मेंदुखे दिलों को इसी आस का सहारा हैख़ुदा तुम्हारा नहीं है ख़ुदा हमारा हैउसे ज़मीन पे ये ज़ुल्म कब गवारा हैतिलिस्म-ए-साया-ए-ख़ौफ़-ओ-हरास तोड़ेंगेक़दम बढ़ाएँगे ज़ंजीर-ए-यास तोड़ेंगेकभी किसी के न हम दिल की आस तोड़ेंगेरहेगा याद जो अहद-ए-सितम गुज़ारा हैउसे ज़मीन पे ये ज़ुल्म कब गवारा है
हम तो मजबूर थे इस दिल से कि जिस में हर दमगर्दिश-ए-ख़ूँ से वो कोहराम बपा रहता हैजैसे रिंदान-ए-बला-नोश जो मिल बैठें बहममय-कदे में सफ़र-ए-जाम बपा रहता हैसोज़-ए-ख़ातिर को मिला जब भी सहारा कोईदाग़-ए-हिरमान कोई, दर्द-ए-तमन्ना कोईमरहम-ए-यास से माइल-ब-शिफ़ा होने लगाज़ख़्म-ए-उम्मीद कोई फिर से हरा होने लगाहम तो मजबूर थे इस दिल से कि जिस की ज़िद परहम ने उस रात के माथे पे सहर की तहरीरजिस के दामन में अँधेरे के सिवा कुछ भी न थाहम ने इस दश्त को ठहरा लिया फ़िरदौस-ए-नज़ीरजिस में जुज़ सनअत-ए-ख़ून-ए-सर-ए-पा कुछ भी न थादिल को ताबीर कोई और गवारा ही न थीकुल्फ़त-ए-ज़ीस्त तो मंज़ूर थी हर तौर मगरराहत-ए-मर्ग किसी तौर गवारा ही न थी
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
मेरे इदराक के नासूर तो रिसते रहतेमेरी हो कर भी वो मेरे लिए क्या कर लेतीहसरत-ओ-यास के गम्भीर अँधेरे में भलाएक नाज़ुक सी किरन साथ कहाँ तक देती
फ़ज़ा में दर्द-आगीं गीत लहराए तो आ जानासुकूत-ए-शब में कोई आह थर्राए तो आ जानाजहाँ का ज़र्रा ज़र्रा यास बरसाए तो आ जानादर-ओ-दीवार पर अंदोह छा जाए तो आ जाना
उस की दानाई का हासिल नाख़ुन-ए-उक़्दा-कुशाताबनाकी-ए-ज़मीर-ओ-ज़ीरकी का आफ़्ताबचाहने वालों का उस की ज़िक्र ही क्या कीजिएउस के दुश्मन भी सिरहाने रखते हैं उस की किताबमाद्दी तारीख़-ए-आलम जिस की तालीफ़-ए-अज़ीमतास कैपिटाल है या ज़ीस्त का लुब्ब-ए-लुबाबपढ़ के जिस के हो गईं हुश्यार अक़वाम-ए-ग़ुलामइश्तिराकी फ़ल्सफ़ा का खुल गया हर दिल में बाबकितने दोज़ख़ उस के इक मंशूर से जन्नत बनेकितने सहराओं को जिस ने कर दिया शहर-ए-गुलाबमार्क्स ने साइंस ओ इंसाँ को किया है हम-कनारज़ेहन को बख़्शा शुऊर-ए-ज़िंदगानी का निसाबउस की बींनिश उस की वज्दानी-निगाह-ए-हक़-शनासकर गई जो चेहरा-ए-इफ़्लास-ए-ज़र को बे-नक़ाब'ग़सब'-ए-उजरत को दिया 'सरमाया' का जिस ने लक़बबे-हिसाब उस की बसीरत उस की मंतिक़ ला-जवाबआफ़्ताब ताज़ा की उस ने बशारत दी हमेंउस की हर पेशन-गोई है बरफ़्गंदा नक़ाबकोई क़ुव्वत उस की सद्द-ए-राह बन सकती नहींवक़्त का फ़रमान जब आता है बन कर इंक़िलाबअहल-ए-दानिश का रजज़ और सीना-ए-दहक़ाँ की ढाललश्कर मज़दूर के हैं हम-सफ़ीर ओ हम-रिकाबकाटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्बसतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आबआज की फ़िरऔनियत भी कुछ इसी अंदाज़ सेरफ़्ता रफ़्ता होती जाएगी शिकार-ए-इंक़िलाबलड़ रहा है जंग आख़िर कीसा-ए-सरमाया-दारजौहरी हथियार से करता नहीं जो इज्तिनाबअपने मुस्तक़बिल से ताग़ूती तमद्दुन को है यासदीदनी है दुश्मन-ए-इंसानियत का इज़्तिराबहज़रत-ए-इक़बाल का इब्लीस-ए-कोचक ख़ौफ़ सेलरज़ा-बर-अंदाम यूँ शैताँ से करता है ख़िताबपंडित ओ मुल्ला ओ राहिब बे-ज़रर ठहरे मगरटूटने वाला है तुझ पर इक यहूदी का इताबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़म्बर ओ लेकिन दर बग़ल दारद किताब
मैं ने गुल-रेज़ बहारों की तमन्ना की थीमुझे अफ़्सुर्दा निगाहों के सिवा कुछ न मिलाचंद सहमी हुई आहों के सिवा कुछ न मिलाजगमगाते हुए तारों की तमन्ना की थीमैं ने मौहूम उमीदों की पनाहें ढूँडींशिद्दत-ए-यास में मुबहम सा इशारा न मिलाडगमगाते हुए क़दमों को सहारा न मिलाहाए किस दश्त-ए-बला-ख़ेज़ में राहें ढूँडेंअब फ़ुसूँ-साज़ बहारों से मुझे क्या मतलबआज ही मेरी निगाहों में वो मंज़र तौबामैं ने देखे हैं लपकते हुए नश्तर तौबाख़ुल्द बर-दोश नज़ारों से मुझे क्या मतलबआसमाँ नूर के नग़्मात से मा'मूर सहीमैं ने घटती हुई चीख़ों के सुने हैं नौहेहाए वो अश्क जो पलकों से ढलक भी न सकेज़िंदगी हुस्न-ओ-जवानी से अभी चूर सहीकभी ज़ौ-पाश सितारों की तमन्ना थी मुझेआज ज़र्रों को भी मक़्सूद बना रक्खा हैआज काँटों को कलेजे से लगा रक्खा हैकभी गुल-रेज़ बहारों की तमन्ना थी मुझे
ख़ल्वत-ओ-जल्वत में तुम मुझ से मिली हो बार-हातुम ने क्या देखा नहीं मैं मुस्कुरा सकता नहींमैं कि मायूसी मिरी फ़ितरत में दाख़िल हो चुकीजब्र भी ख़ुद पर करूँ तो गुनगुना सकता नहींमुझ में क्या देखा कि तुम उल्फ़त का दम भरने लगींमैं तो ख़ुद अपने भी कोई काम आ सकता नहींरूह-अफ़ज़ा हैं जुनून-ए-इश्क़ के नग़्मे मगरअब मैं इन गाए हुए गीतों को गा सकता नहींमैं ने देखा है शिकस्त-ए-साज़-ए-उल्फ़त का समाँअब किसी तहरीक पर बरबत उठा सकता नहींदिल तुम्हारी शिद्दत-ए-एहसास से वाक़िफ़ तो हैअपने एहसासात से दामन छुड़ा सकता नहींतुम मिरी हो कर भी बेगाना ही पाओगी मुझेमैं तुम्हारा हो के भी तुम में समा सकता नहींगाए हैं मैं ने ख़ुलूस-ए-दिल से भी उल्फ़त के गीतअब रिया-कारी से भी चाहूँ तो गा सकता नहींकिस तरह तुम को बना लूँ मैं शरीक-ए-ज़िंदगीमैं तो अपनी ज़िंदगी का बार उठा सकता नहींयास की तारीकियों में डूब जाने दो मुझेअब मैं शम-ए-आरज़ू की लौ बढ़ा सकता नहीं
ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुईपत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुईमौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश हैशाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश हैचंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुएजैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुएखप गया है यूँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंगजिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंगउमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिएया चली है बाल खोले राँड रोने के लिएजितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान हैहर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान हैइक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहींचिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहींसो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँहो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँहाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागरले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम करदिल सँभलता ही नहिं है सीना-ए-सद-चाक मेंफूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक मेंउड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआरहो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशारहसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश मेंसैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश मेंउम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिएबार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिएचाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहींहाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहींथरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़रले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सरजब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँआह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँहो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराममुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवामदोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गयाप्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गयाले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरारआग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रारपड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभीउँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभीआ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईंऔर कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईंइतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहींयास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहींआ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूकफट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूकअपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद हैऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद हैबाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहारख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकारजब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथदिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगीये नहिं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगीवाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोईचाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोईवाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैंरहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैंदिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गयाहाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गयातिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफतीपी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपतीमौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गएसाँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गएआँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गईमौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गईऔर कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दामऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम
जीने से दिल बेज़ार हैहर साँस इक आज़ार हैकितनी हज़ीं है ज़िंदगीअंदोह-गीं है ज़िंदगीवो बज़्म-ए-अहबाब-ए-वतनवो हम-नवायान-ए-सुख़नआते हैं जिस दम याद अबकरते हैं दिल नाशाद अबगुज़री हुई रंगीनियाँखोई हुई दिलचस्पियाँपहरों रुलाती हैं मुझेअक्सर सताती हैं मुझेवो ज़मज़मे वो चहचहेवो रूह-अफ़ज़ा क़हक़हेजब दिल को मौत आई न थीयूँ बे-हिसी छाई न थीकॉलेज की रंगीं वादियाँवो दिल नशीं आबादियाँवो नाज़नीनान-ए-वतनज़ोहरा-जबीनान-ए-वतनजिन में से इक रंगीं क़बाआतश-नफ़स आतिश-नवाकर के मोहब्बत आश्नारंग-ए-अक़ीदत आश्नामेरे दिल-ए-नाकाम कोख़ूँ-गश्ता-ए-आलाम कोदाग़-ए-जुदाई दे गईसारी ख़ुदाई ले गईउन साअतों की याद मेंउन राहतों की याद मेंमग़्मूम सा रहता हूँ मैंग़म की कसक सहता हूँ मैंसुनता हूँ जब अहबाब सेक़िस्से ग़म-ए-अय्याम केबेताब हो जाता हूँ मैंआहों में खो जाता हूँ मैंफिर वो अज़ीज़-ओ-अक़रिबाजो तोड़ कर अहद-ए-वफ़ाअहबाब से मुँह मोड़ करदुनिया से रिश्ता तोड़ करहद्द-ए-उफ़ुक़ से उस तरफ़रंग-ए-शफ़क़ से उस तरफ़इक वादी-ए-ख़ामोश कीइक आलम-ए-बेहोश कीगहराइयों में सौ गएतारीकियों में खो गएउन का तसव्वुर ना-गहाँलेता है दिल में चुटकियाँऔर ख़ूँ रुलाता है मुझेबे-कल बनाता है मुझेवो गाँव की हम-जोलियाँमफ़लूक दहक़ाँ-ज़ादीयाँजो दस्त-ए-फ़र्त-ए-यास सेऔर यूरिश-ए-अफ़्लास सेइस्मत लुटा कर रह गईंख़ुद को गँवा कर रह गईंग़मगीं जवानी बन गईंरुस्वा कहानी बन गईंउन से कभी गलियों में अबहोता हूँ मैं दो-चार जबनज़रें झुका लेता हूँ मैंख़ुद को छुपा लेता हूँ मैंकितनी हज़ीं है ज़िंदगीअंदोह-गीं है ज़िंदगी
गुनगुना के मस्ती में साज़ ले लिया मैं नेछेड़ ही दिया आख़िर नग़्मा-ए-वफ़ा मैं नेयास का धुआँ उट्ठा हर नवा-ए-ख़स्ता सेआह की सदा निकली बर्बत-ए-शिकस्ता से
नतीजा सुन के कई लोग बद-हवास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएसिला मिला है हमें साल भर की मेहनत काचमक रहा है सितारा हमारी क़िस्मत कायही तो वक़्त मिला है हमें मसर्रत काजो फ़ेल हो गए वो किस क़दर उदास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएवो इम्तिहान में रातों को जाग कर पढ़नावो नींद आँखों में छाई हुई मगर पढ़नावो आधी रात से बिस्तर पे ता-सहर पढ़नाज़हे-नसीब वो लम्हात हम को रास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएजो खेल-कूद में दिन-रात चूर रहते थेहर एक खेल में शामिल ज़रूर रहते थेजो सुब्ह-ओ-शाम किताबों से दूर रहते थेजहाँ में आज वही मुब्तला-ए-यास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएजिन्हें था अपनी लियाक़त पे ए'तिबार बहुतजिन्हें ख़ुद अपने क़लम पर था इख़्तियार बहुतजो अपने आप को समझे थे होशियार बहुतउन्हीं के होश उड़े और गुम हवास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
मैं अक्सर सर्द रातों मेंज़मीन-ए-ख़ाना-ए-दिल परअकेले बैठ जाता हूँफिर अपना सर झुका कर याद-ए-अहद-ए-रफ़्तगाँ दिल में सजाता हूँख़याल-ए-माज़ी-ए-दौराँ मिरे इस जिस्म के अंदर अजब तूफ़ाँ उठाता हैहज़ारों मील का लम्बा सफ़र पैदल कराता हैमैं यादों के धुँदलकों में तुम्हारे नक़्श-ए-पा को ढूँडने जब भी निकलता हूँतो इक तारीक वादी में उतरता हूँजहाँ यादों की कुछ बे-रंग तस्वीरें मुझे बिखरी पड़ी मा'लूम देती हैंमुझे आवाज़ देती हैंकि वहशत का ये जंगल बाहें फैलाए बुलाता हैमिरा शौक़-ए-नज़र थक कर ज़मीन पर बैठ जाता हैअचानक जब तुम्हारी याद के वहशी जानवर आवाज़ देते हैंमैं डरता हूँकि जैसे कोई बच्चा अपने ही साए से डर जाएकोई शीशा बिखर जाएकोई फ़ुर्क़त में घबराएमिरे तार-ए-नफ़स पर ज़र्ब करती मुस्तक़िल धड़कनमुझे रुकने नहीं देतीमुझे थकने नहीं देतीये बेचैनी मुझे फिर इक सफ़र पर ले के आती हैमैं चलता हूँकि जैसे इक मुसाफ़िर बा'द मुद्दत अपने घर जाएठिठुरती सर्द रातों मेंकोई जैसे कि जम जाएकि जैसे साँस थम जाएमगर मेरे मुक़द्दर मेंसुकून-ए-क़ल्ब-ओ-जाँ कब हैनिगाह-ए-यास में मुबहम सही कोई निशाँ कब हैकहीं पर शोरिश-ए-अमवाज-ए-दरिया हैकहीं आवाज़-ए-क़ुलक़ुल हैमगस का शोर है सरसर सबा की आह-ओ-गिर्या हैसो दिल अपना मचलता हैकिसी से कब बहलता हैधुआँ उठता है दिल से आँख में तूफ़ाँ मचलता हैतबीअत ज़ोर करती हैये धड़कन शोर करती हैतुम्हारी याद के ये चीख़ते और पीटते लम्हेमुझे रोने नहीं देतेमुझे सोने नहीं देते
मौत अपनी न अमल अपना न जीना अपनाखो गया शोरिश-ए-गीती में क़रीना अपनानाख़ुदा दूर हवा तेज़, क़रीं काम-ए-नहंगवक़्त है फेंक दे लहरों में सफ़ीना अपनाअरसा-ए-दहर के हंगामे तह-ए-ख़ाब सहीगर्म रख आतिश-ए-पैकार से सीना अपनासाक़िया रंज न कर जाग उठेगी महफ़िलऔर कुछ देर उठा रखते हैं पीना अपनाबेश-क़ीमत हैं ये ग़म-हा-ए-महब्बत मत भूलज़ुल्मत-ए-यास को मत सौंप ख़ज़ीना अपना
यूँ लब से अपने निकले है अब बार-बार आहकरता है जिस तरह कि दिल-ए-बे-क़रार आहहम ईद के भी दिन रहे उम्मीद-वार आहहो जी में अपने ईद की फ़रहत से शाद-कामख़ूबाँ से अपने अपने लिए सब ने दिल के कामदिल खोल खोल सब मिले आपस में ख़ास ओ आमआग़ोश-ए-ख़ल्क़ गुल-बदनों से भरे तमामख़ाली रहा पर एक हमारा कनार आहक्या पूछते हो शोख़ से मिलने की अब ख़बरकितना ही जुस्तुजू में फिरे हम इधर इधरलेकिन मिला न हम से वो अय्यार फ़ित्नागरमिलना तो इक तरफ़ है अज़ीज़ो कि भर-नज़रपोशाक की भी हम ने न देखी बहार आहरखते थे हम उमीद ये दिल में कि ईद कोक्या क्या गले लगावेंगे दिल-बर को शाद होसो तू वो आज भी न मिला शोख़-ए-हीला-जूथी आस ईद की सो गई वो भी दोस्तोअब देखें क्या करे दिल-ए-उम्मीद-वार आहउस संग-दिल की हम ने ग़रज़ जब से चाह कीदेखा न अपने दिल को कभी एक दम ख़ुशीकुछ अब ही उस की जौर-ओ-तअद्दी नहीं नईहर ईद में हमें तो सदा यास ही रहीकाफ़िर कभी न हम से हुआ हम-कनार आहइक़रार हम से था कई दिन आगे ईद सेयानी कि ईद-गाह को जावेंगे तुम को लेआख़िर को हम को छोड़ गए साथ और केहम हाथ मलते रह गए और राह देखतेक्या क्या ग़रज़ सहा सितम-ए-इंतिज़ार आहक्यूँ कर लगें न दिल में मिरे हसरतों के तीरदिन ईद के भी मुझ से हुआ वो कनारा-गीरइस दर्द को वो समझे जो हो इश्क़ का असीरजिस ईद में कि यार से मिलना न हो 'नज़ीर'उस के उपर तो हैफ़ है और सद-हज़ार आह
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