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नज़्म
तुम्हारा नाम लेता हूँ
तो सदियों क़ब्ल के लाखों सहीफ़ों के मुक़द्दस लफ़्ज़ मेरा साथ देते हैं
रहमान फ़ारिस
नज़्म
दौर-दौरा लखनऊ में भी था क़ब्ल-अज़-इंक़लाब
कर लिया था नुक्ता-संजों ने इसी को इंतिख़ाब