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नज़्म
मगर तू यहाँ चाक पर अपनी धुन में मगन है निगाहें उठा
देख तो मैं जहाँ ज़ाद तेरी तिरे सामने हूँ
इशरत आफ़रीं
नज़्म
ख़ुदा के फ़ज़्ल से अहल-ए-हुनर हैं अहल-ए-फ़न सब हैं
मगर डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाने में मगन सब हैं