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नज़्म
बुलंद-आहंगियों ने फाड़ डाले कान के पर्दे
हूँ वो मुतरिब जो ख़ुद अपनी सदा ही सुन नहीं सकता
परवेज़ शाहिदी
नज़्म
मिरे तख़य्युल को बोलने का हुनर नहीं था
हुरूफ़ जितने ख़िरद की फ़रहंग में पड़े थे
निसार महमूद तासीर
नज़्म
जवानियाँ हैं ज़ोर पर शबाब का ज़ुहूर है
ब-फ़ैज़-ए-क़ल्ब-ए-मुतमइन नज़र नज़र ग़यूर है