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नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
जौन एलिया
नज़्म
देखो कितने थक से गए हो
कितनी थकन आँखों में घुली है
आओ तुम्हारे वास्ते साथी
अब भी मिरी आग़ोश खुली है
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
गर फ़िक्र-ए-ज़ख्म की तो ख़ता-वार हैं कि हम
क्यूँ महव-ए-मद्ह-ए-खूबी-ए-तेग़-ए-अदा न थे