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नज़्म
क्यूँ न उन दोनों पे मिटने की हो हसरत अख़्तर
उफ़ वो उस रात की बात आह वो उस बात की रात
अख़्तर शीरानी
नज़्म
इन दोनों में रन पड़ता है
नित बस्ती-बस्ती नगर-नगर
हर बस्ते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर