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नज़्म
ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें हम भूले हुओं को याद न कर
पहले ही बहुत नाशाद हैं हम तू और हमें नाशाद न कर
अख़्तर शीरानी
नज़्म
मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता
सकूँ लेकिन मिरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फ़ज़ा में दर्द-आगीं गीत लहराए तो आ जाना
सुकूत-ए-शब में कोई आह थर्राए तो आ जाना
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
हो ढेर अकेला जंगल में तू ख़ाक लहद की फाँकेगा
उस जंगल में फिर आह 'नज़ीर' इक तिनका आन न झाँकेगा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
आ बताऊँ तुझ को रम्ज़-ए-आया-ए-इन्नल-मुलूक
सल्तनत अक़्वाम-ए-ग़ालिब की है इक जादूगरी