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नज़्म
पास था अपने क़ौल का जिस को तू ने कुछ उस का पास किया
आमद-ओ-रफ़्त-ए-देरीना का भूल के भी एहसास किया
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
क्या तुझे भी इंतिज़ार-ए-आमद-ए-महबूब है
क्यों परेशाँ इस क़दर है क्या तुझे मतलूब है